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Friday, May 21, 2010

दिल से - 2


कोई मंजिल नहीं जचती, समय अच्छा नहीं लगता, अगर घर लौट भी आऊ तो घर अच्छा नहीं लगता, करू कुछ भी मैं अब दुनिया को, सब अच्छा ही लगता है, मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन, मगर अच्छा नहीं लगता......


कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ, किसी की एक तरन्नुम में तराने भूल आया हूँ, मेरी अब राह मत तकना, कभी ए आस्मा वालो, मैं एक लड़की की आँखों मैं उड़ने भूल आया हूँ..


पुकारे आँख में चढ़ कर, तो खुद को यू समझता है, अँधेरा किसको कहते है, यह बस जुगनू समझता है, हमे तो चाँद तारो में भी तेरा रूप दिखता है, मोहब्बत में नुमाइश को अदाए तू समझता है "..


जब आता है जीवन में खयालातो का हंगामा, हसीबातो या जज्बातों, मुलाकातों का हंगामा, जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते है सब, यह हंगामे की राते है, या है रातो का हंगामा..


कोई कब तक महज सोचे, कोई कब तक महज गाये, इलाही याद मुमकिन है कि कुछ ऐसा भी हो जाये, मेरा महताब उसकी रात के आगोश में पिघले, में उसकी नींद में जागु वो मुझमे घुल के सो जाये..


वो समुन्दर नहीं था, थे आसू मेरे जिसमे तुम तैरते और नहाते रहे, और एक हम थे जो लोगो की उस भीड़ में बस किनारे पे डुबकी लगाते रहे..


महफ़िल महफ़िल मुस्काना तो पड़ता है, खुद ही खुद को समझाना तो पड़ता है, उनकी आँखों से होकर दिल तक जाना, रस्ते मैं यह महखाना तो पड़ता है, तुमको पाने की कोशिश में ख़त्म हुए, इश्क मैं इतना जुरमाना तो पड़ता है..


मैं उसका हूँ, वो इस एहसास से इन्कार करती है, भरी महफ़िल में भी रुसवा मुझे हर बार करती है, यकि है सारी दुनिया को, खफा है मुझसे वो लेकिन, मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करती है..


यह दिल बरबाद करके इसमें क्यों आबाद रहते हो, कोई कल कह रहा था तुम इलाहाबाद रहते हो, यह कैसी शौहरते मुझको अता कर दी मेरे मौला, में सब कुछ भूल जाता हूँ, मगर तुम याद रहती हो..

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