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Wednesday, June 16, 2010

संसद भवन लगती हो तुम


फोटोग्राफर ने एक आँख मीच कर कहा, जिसे खीचता रहू वो पोस लगती हो तुम

खाट पर पड़े मरीज़ ने कहा, मुझे जीवन बचाने वाली डोस लगती हो तुम

माली बोला बार बार सूघने को मन करे, नया नया खिला रेड रोस लगती हो तुम

लार टपकाते हुए चौबे जी चहक उठे, भूखा चार दिन से हूँ, भोज लगती हो तुम

कांग्रेसी तुम्हे देख देख के पुकारते है, सोनिया की जैसी तस्वीर लगती हो तुम

कहा यह समाजवादियो ने पूरी आस्था से, लोहिया की नीती की लकीर लगती हो तुम

साम्यवादी आपस में बात करने लगे की, लेनी ने कहा हमको ज़मीर लगती हो तुम

भाजपा वालो ने कहा तुम्हे नहीं छोड़ने की, क्यों की हमको तो कश्मीर लगती हो तुम

शुगर के जितने मरीज़ मीठा छोड़ चुके, उनको ज़रूरी नमकीन लगती हो तुम

लाखो अंखियो में काले काले मेघ घिरते है, जब भी ज़रा सी ग़मगीन लगती हो तुम

प्रोपरटी डीलर हड़पने को आतुर है, लफड़े की उनको ज़मीन लगती हो तुम

खाट जिनकी खड़ी हुई है कई बरसो से, ऐसे खूसटो को भी हसीन लगती हो तुम

की तुम्हे देखते ही मन नाचने को करता है, मन का मयूर बोला घन लगती हो तुम

जिसके समीप आके शीतलता मिलती है, सरपो को चन्दन का वन लगती हो तुम

परेशान जिसे आयकर वाले करते है, उसे एक नंबर का धन लगती हो तुम

नेता बोला मार दूंगा सबको तुम्हारे लिए, मुझ को तो संसद भवन लगती हो तुम

धन्यवाद् !!!!

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