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Friday, July 30, 2010

कारगिल के वीर सपूतो को हिन्दी कविता का सलाम


कारगिल द्रास और बटालिक की घाटी में भारतीय लाल जो निज शीश हो गए,

सारी बर्फ चोटिया तीर्थ के समान हुई, जिन्हें रणवीर निज श्रोणित से धो गए

तो पग पग पर लहू से वन्दे मातरम लिखा, आन बान के प्रति चिर नींद सो गए,

पंचतत्व का शारीर ही तो सिर्फ विलीन हुआ, सारे ही शहीद आसमा के तारे हो गए

सिन्दूर सुहागनों के सीमा पर शहीद हुए, निज मात और पिता के अंखियो के तारे थे

भोले भाले बचपन की सदा उल्लेख मिले, बहनों की रखियो के आन बान रखवाले थे

तो प्राण दान देके जो सुरक्षा सम्मान दिया, प्यारे भारत के चीर परुष जियारे थे

कोटि कोटि कर आज नमन हम उनको, वो सारे ही शहीद भारतीयों के दुलारे थे

Saturday, July 24, 2010

प्यार की कहानी, दिल की जबानी


गैल्लेरी से झांकती लड़की तो दिखती है, खिड़की में खड़ा उसका बाप नहीं दिखता,
प्यार वाला राग जब बजता है दिल में तो, आरती अजानता अलाप नहीं दिखता

तो प्यार करने का हक़ सबको मिला है यहाँ, प्यार करने में कोई पाप नहीं दिखता,
पर जब देखता हूँ उसके मैं बाप को तो, अपना मिलन या मिलाप नहीं दिखता

और रथ पर सवार स्वर्ग अप्सराए तो दिखती है, भैसे पर सवार यमराज नहीं दिखता
मंच पर बैठी हुई कवित्री तो दिखती है, माइक पर खड़ा कविराज नहीं दिखता

तो किसको मैं दिल दूँ और किसको मैं प्यार करू, मुझे यहाँ कोई हमराज नहीं दिखता
प्यार के किटाणु मेरे अन्दर समा गए है, मुझे अपना कोई इलाज़ नहीं दिखता

Friday, July 23, 2010

लड़कियां हुई फैन

एक बार कॉलेज में मेरी कविताए सुन, कुछ लड़कियां हो गयी थी मेरी फैन जी,

बस
उस रोज़ से ही उड़ गयी नींद मेरी, और कुछ दिन तक आया नहीं चैन जी.

क्युकि
एक कोमल सी कामिनी से वहाँ मेरा, टकराया चश्मा की लड़ गए नैन जी,

पर
उसके भाई को देखते ही मैंने कहा, जैसी आप की बहन वैसी मेरी बहन जी..

क्या मिला भारत-पाक वारता से


बार बार वारता से कोई फायदा नहीं है, बात इतनी सी हम जानते है क्यों नहीं

कुत्ते वाली पूछ है यह सीधी कभी होगी नहीं, काटनी पड़ेगी आप मानते है क्यों नहीं

जिन लोगो ने हजारो घर ही उजाड़ दिए, उन जैसे जाहिलो को मारते हो क्यों नहीं

और पूरे पाकिस्तान पर अपना तिरंगा फैले, एक ऐसा युद्ध आप ठानते हो क्यों नहीं

Saturday, July 17, 2010

भारत का पाकिस्तान को जवाब


कभी अमेरिका और गौरी से डराता हमे अकड़ दिखाता पल में ही मुड़ जायेगा

नाग पृथ्वी त्रिशूल, अगनी न जाना भूल, परमाणु बम्ब का भी फ्यूस जुड़ जायेगा

तो आको की दम पर जो गुब्बारे सा फूलता है, पड़ेगी जो मार पल में सुधर जायेगा

और 100 करोड़ फूँक मार देंगे एक बार, ऐसी आंधिया चलेगी सारा पाक उड़ जायेगा...

Thursday, July 15, 2010

दिल से - 3


यह ऊचे घराने की बिगड़ी हुई लड़कियां है, जो प्यार के मंदिर को बाजार समझती है, पागल है मगर खुद को हुशियार समझती है.......


मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ सोचा नहीं जाता, कहा जाता है उसको बेवफा पर समझा नहीं जाता..


अमावस की काली रातो में, दिल का दरवाज़ा खुलता है, जब दर्द की प्याली रातो में, गम आसू के संग घुलता है, जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते है, जब घड़िया टिक टिक चलती है, सब सोते है हम रोते है, जब बार बार दोहराने से सारी यादे चुब जाती है, जब ऊच नीच समझाने में माथे की नस दुख जाती है, तब एक पगली लड़की के बिन जीना गददारी लगता है, और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है..


ब्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा, हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा, अभी तक डूब कर सुनते थे सब खिस्सा मोहब्बत का, मैं खिस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा..


बस्ती बस्ती घोर उदासी, पर्वत पर्वत खालीपन, मन हीरा बेमोल लुट गया, घिस घिस रीता तन चन्दन, इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गजब की है, एक तो तेरा भोलापन है, एक मेरा दीवानापन..


जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल ऐसा एक तारा है, जो हमको भी प्यारा है, और जो तुमको भी प्यारा है, झूम रही है सारी दुनिया जबकि हमारे गीतों पर, तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या एहसान तुम्हरा है..


कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा, गिरेबा अपना आसू में भिगोता हूँ तो हंगामा, नहीं मुझ पर भी जो खुद की, खबर वो है ज़माने पर, मैं हस्ता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा..


पुकारे आँख में चढ़ कर, तो खुद को यू समझता है, अँधेरा किसको कहते है, यह बस जुगनू समझता है, हमे तो चाँद तारो में भी तेरा रूप दिखता है, मोहब्बत में नुमाइश को अदाए तू समझता है

Tuesday, July 13, 2010

गुरूजी की क्लास


विद्यापति के पदों में खूब है श्रृंगाररस, गुरूजी पढ़ा रहे थे MA वाली क्लास में,

राधातन परछाई पड़ी जब श्याम की तो सांस में भी सांस घूली प्रेम रस रास में


पध को पढ़ा के रास्ते से गुजरे गुरूजी, एक छोरा छोरी बैठे देखे पास पास में,


छोरा बोला क्लास में यह समझी न पध भाव, इसीलिए समझा रहा हूँ इसे घास में...