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Thursday, July 15, 2010

दिल से - 3


यह ऊचे घराने की बिगड़ी हुई लड़कियां है, जो प्यार के मंदिर को बाजार समझती है, पागल है मगर खुद को हुशियार समझती है.......


मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ सोचा नहीं जाता, कहा जाता है उसको बेवफा पर समझा नहीं जाता..


अमावस की काली रातो में, दिल का दरवाज़ा खुलता है, जब दर्द की प्याली रातो में, गम आसू के संग घुलता है, जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते है, जब घड़िया टिक टिक चलती है, सब सोते है हम रोते है, जब बार बार दोहराने से सारी यादे चुब जाती है, जब ऊच नीच समझाने में माथे की नस दुख जाती है, तब एक पगली लड़की के बिन जीना गददारी लगता है, और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है..


ब्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा, हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा, अभी तक डूब कर सुनते थे सब खिस्सा मोहब्बत का, मैं खिस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा..


बस्ती बस्ती घोर उदासी, पर्वत पर्वत खालीपन, मन हीरा बेमोल लुट गया, घिस घिस रीता तन चन्दन, इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गजब की है, एक तो तेरा भोलापन है, एक मेरा दीवानापन..


जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल ऐसा एक तारा है, जो हमको भी प्यारा है, और जो तुमको भी प्यारा है, झूम रही है सारी दुनिया जबकि हमारे गीतों पर, तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या एहसान तुम्हरा है..


कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा, गिरेबा अपना आसू में भिगोता हूँ तो हंगामा, नहीं मुझ पर भी जो खुद की, खबर वो है ज़माने पर, मैं हस्ता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा..


पुकारे आँख में चढ़ कर, तो खुद को यू समझता है, अँधेरा किसको कहते है, यह बस जुगनू समझता है, हमे तो चाँद तारो में भी तेरा रूप दिखता है, मोहब्बत में नुमाइश को अदाए तू समझता है

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